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प्राचीन भारतीय शास्त्र के क्षेत्र में सोमदेव सूरी का अध्ययन

  • Jul 11, 2024
  • 1 min read

Research Paper | 2026 | Volume 1 | Issue 02 | Page 37-41


प्रो० सुरेश कुमार सुमन, इतिहास विभाग, एम. एड. डी. कॉलेज चंदौली उजियारपुर, समस्तीपुर, ल.ना.मि.वि., कामेश्वरनगर, दरभंगा


सार-संक्षेप

भारतीय वांग्मय में राजनीति और शासन-संचालन का विशिष्ट ज्ञान वैदिक काल से ही निरंतर विद्यमान रहा है । प्राचीन भारतीय राजशास्त्र के प्रणेताओं में कतिपय महान चिन्तक और दार्शनिक हुए हैं, जिनमें जैन धर्मावलम्बी आचार्य सोमदेव सूरि को इस परंपरा का अंतिम महान प्रणेता स्वीकार किया जाता है । सोमदेव सूरि के राजनीतिक चिंतन पर महान नीतिवेत्ता कौटिल्य (चाणक्य) का सर्वाधिक प्रभाव परिलक्षित होता है । दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा ग्यारहवीं शताब्दी के प्रथम चरण की भारतीय राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक विचारधारा को समझने के लिए सूरि द्वारा विरचित 'नीतिवाक्यामृतम्' एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इस ग्रंथ की अपनी विशिष्ट उपयोगिता, व्यावहारिक दृष्टिकोण और मौलिकता है । प्राचीन मनीषियों (विशेष रूप से महर्षि वृहस्पति और आचार्य कौटिल्य) के अर्थशास्त्र के विचारों का समन्वय करते हुए सोमदेव सूरि ने तत्कालीन देश-काल और परिस्थितियों के अनुरूप अपनी अनूठी मौलिकता का परिचय दिया है । अतः 'नीतिवाक्यामृतम्' राजशास्त्र का एक विशुद्ध और व्यावहारिक ग्रंथ है, जो तत्कालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन हेतु एक अनिवार्य साधन प्रस्तुत करता है । सोमदेव सूरि की सांस्कृतिक अवधारणा, सामाजिक व्यवस्था, धर्म, शिक्षा पद्धति और राजनीतिक दर्शन आज भी भविष्य के लिए एक साक्ष्य और उदाहरण के रूप में उपस्थित हैं ।


 
 
 

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