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प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था में सोमदेव सूरि की न्याय संबंधी विचारों का विश्लेषण

  • Jul 19, 2024
  • 2 min read

Research Paper | 2026 | Volume 1 | Issue 02 | Page 32-36

प्रो० सुरेश कुमार सुमन,

इतिहास विभाग, एम. एड. डी. कॉलेज चंदौली उजियारपुर, समस्तीपुर, ल.ना.मि.वि., कामेश्वरनगर, दरभंगा।



परिचय :

प्रखर प्रतिभा के धनी, महान नीतिवेत्ता सोमदेव सूरि ने अपने समय से हजारों वर्ष पूर्व नीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वानों द्वारा प्रणीत नीति विषयक चिन्तनों का भी गहन अध्ययन मनन किया था। समाज बिना किसी बाधा के अपने धर्मों अथवा कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठा रख सके उसको अधिकारों की पूरी सुविधा मिले, इसीलिए न्याय की आवश्यकता हुई। प्राचीन आचार्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण कौटिल्य हैं। न्याय व्यवस्था को उन्होंने दो भागो में विभाजित किया है। प्राचीन भारत की राज्य व्यवस्था में धर्म का स्थान सबसे ऊँचा था। समाज के सभी वर्ग, वर्ण और समस्त कार्य प्रणाली के मूल में धर्म घुला मिला था। राज्य का सर्वोच्च व्यवस्थापक राजा भी धर्म के बंधन में जकड़ा था। किसी भी संस्कार को संशोधित करने का उसे कोई अधिकार नही था, राजा को धर्म का ही एक अंग माना जाता था। 'मनुस्मृति' में तो राजा को अर्थदंड देने तक की बात कही गई है। लेकिन कौटिल्य ने इतनी छूट दी है कि राजा कानून बना सकता है। लेकिन ऐसा कानून नहीं बना सकता जो धर्म के विरुद्ध हो। प्राचीन हिन्दू राज्य व्यवस्था यद्यपि एक राजत्व पर आधारित थी, फिर भी न्याय विभाग शासन विभाग से अलग रखा जाता था। उस समय राजनीति के महान् विद्वान तथा उत्तम नैतिक आचरण वाले पुरोहित एवं ब्राह्मण लोग मंत्री नियुक्त किये जाते थे और वही न्यायाधीश भी हुआ करते थे। धर्म संबंधी सारी शासन व्यवस्था पुरोहितों के अधिकार क्षेत्र में थी। उस समय पुरोहित न्यायाधीश पर राजा का कोई नियंत्रण नहीं होता था। न्यायपालिका किसी भी प्रकार के दबाव से मुक्त थी। न्यायाधीशों की सहायता के लिए समाज के लोगों की एक स्वतंत्र संस्था भी होती थी, जिसे सभा कहा जाता था। यह कानूनी अदालत थी। मनु के मतानुसार तीन पंच, न्यायाधीशों की सहायता के लिए होते थे और जो कानून पारित किया जाता था, उसका ठीक तरह से अर्थ बतलाने के लिए एक विद्वान् ब्राह्मण हुआ करता था। धर्माधिकारी का कार्य लोक व्यवहार में प्रचलित धर्मों की समीक्षा करना था। उसे यह जाँच करनी थी कि ये व्यवहार धर्मशास्त्र सम्मत है या नहीं। तदुपरांत वह राजा से ऐसे कानून बनवाने का अनुरोध करता था जो लोक हितकारी हो। इस दृष्टि से राजा सर्वदा प्राड्विवाक और धर्माधिकारी के अधीन हुआ करता था। राजा सतत प्रजा को सावधान करता रहता था कि वह प्राड्विवाक तथा धर्माधिकारी की आज्ञाओं पर चले।




 
 
 

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